
चाँद और चोर
चाँद ने भी जब रूठने की ठान ली
तारे है गर्दिश में ये बात हमने मन ली
सुनसान अँधेरी रात में सूझती नहीं गली
बस हाथ में वो हाथ हो ये कमी थी खली
धीरे धीरे धीमी धीमी हलकी सी
हवा चली
चलते चलते बस युही रात भी ढलने लगी
दूर कहीं फिर एक सूरज की किरण जली
धीरे धीरे गलियों में भी मचने लगी खलबली
अलग थलग गलियों से कुछ अलग थलग ध्वनि निकली
कोई बोले हरे राम , हरे कृष्ण
कोई बोले या अली
मैं रात भर जागा
गली गली भागा
सब मिले थे पराये
कोई न था सगा
रात की राज की एक बात बताना भूल गया
रात को राह में मुझे किसी ने था ठगा
पर सच कहता हूँ
मुझे बुरा नहीं लगा
मुझे बुरा नहीं लगा